शनिवार, 24 अप्रैल 2010

चिट्ठा (अंग्रेज़ी:ब्लॉग), बहुवचन: चिट्ठे (अंग्रेज़ी:ब्लॉग्स), वेब लॉग (weblog) शब्द का सूक्ष्म रूप होता है। चिट्ठे एक प्रकार के व्यक्तिगत जालपृष्ठ (वेबसाइट) होते हैं जिन्हें दैनन्दिनी (डायरी) की तरह लिखा जाता है।[१] हर चिट्ठे में कुछ लेख, फोटो और बाहरी कड़ियां होती हैं। इनके विषय सामान्य भी हो सकते हैं और विशेष भी। चिट्ठा लिखने वाले को चिट्ठाकार तथा इस कार्य को चिट्ठाकारी अथवा चिट्ठाकारिता कहा जाता है। कई चिट्ठे किसी खास विषय से संबंधित होते हैं, व उस विषय से जुड़े समाचार, जानकारी या विचार आदि उपलब्ध कराते हैं। एक चिट्ठे में उस विषय से जुड़े पाठ, चित्र/मीडिया व अन्य चिट्ठों के लिंक्स मिल सकते हैं। चिट्ठों में पाठकों को अपनी टीका-टिप्पणियां देने की क्षमता उन्हें एक इंटरैक्टिव प्रारूप प्रदन प्रदान करती है।[२] अधिकतर चिट्ठे मुख्य तौर पर पाठ रूप में होते हैं, हालांकि कुछ कलाओं(आर्ट ब्लॉग्स), छायाचित्रों (फोटोग्राफ़ी ब्लॉग्स), वीडियो, संगीत (एमपी३ ब्लॉग्स) एवं ऑडियो (पॉडकास्टिंग) पर केन्द्रित भी होते हैं।

चिट्ठा बनाने के कई तरीके होते हैं, जिनमें सबसे सरल तरीका है, किसी अंतर्जाल पर किसी चिट्ठा वेसाइट जैसे ब्लॉग्स्पॉट या लाइवजर्नल या वर्डप्रेस आदि जैसे स्थलों में से किसी एक पर खाता खोल कर लिखना शुरू करना।[३]एक अन्य प्रकार की चिट्ठेकारी माइक्रोब्लॉगिंग कहलाती है। इसमें अति लघु आकार के पोस्ट्स होते हैं।

दिसंबर २००७ तक, ब्लॉग सर्च इंजिन टेक्नोरैटी द्वारा ११२,०००,००० चिट्ठे ट्रैक किये जा रहे थे।[४]

आज के कंप्यूटर जगत में ब्लॉग का भारी चलन चल पड़ा है। कई प्रसिद्ध मशहूर हस्तियों के ब्लॉग लोग बड़े चाव से पढ़ते हैं और उन पर अपने विचार भी भेजते हैं। चिट्ठों पर लोग अपने पसंद के विषयों पर लिखते हैं और कई चिट्ठे विश्व भर में मशहूर होते हैं जिनका हवाला कई नीति-निर्धारण मुद्दों में किया जाता है। ब्लॉग का आरंभ १९९२ में लांच की गई पहली वेबसाइट के साथ ही हो गया था। आगे चलकर १९९० के दशक के अंतिम वर्षो में जाकर ब्लॉगिंग ने जोर पकड़ा। आरंभिक ब्लॉग कंप्यूटर जगत संबंधी मूलभूत जानकारी के थे। लेकिन बाद में कई विषयों के ब्लॉग सामने आने लगे। वर्तमान समय में लेखन का हल्का सा भी शौक रखने वाला व्यक्ति अपना एक ब्लॉग बना सकता है, चूंकि यह निःशुल्क होता है, और अपना लिखा पूरे विश्व के सामने तक पहुंचा सकता है।[२]

चिट्ठों पर राजनीतिक विचार, उत्पादों के विज्ञापन, शोधपत्र और शिक्षा का आदान-प्रदान भी किया जाता है। कई लोग चिट्ठों पर अपनी शिकायतें भी दर्ज कर के दूसरों को भेजते हैं। इन शिकायतों में दबी-छुपी भाषा से लेकर बेहद कर्कश भाषा तक प्रयोग की जाती है।वर्ष २००४ में ब्लॉग शब्द को मेरियम-वेबस्टर में आधिकारिक तौर पर सम्मिलित किया गया था। कई लोग अब चिट्ठों के माध्यम से ही एक दूसरे से संपर्क में रहने लग गए हैं। इस प्रकार एक तरह से चिट्ठाकारी या ब्लॉगिंग अब विश्व के साथ-साथ निजी संपर्क में रहने का माध्यम भी बन गया है। कई कंपनियां आपके चिट्ठों की सेवाओं को अत्यंत सरल बनाने के लिए कई सुविधाएं देने लग गई हैं।

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

सोचें क्या होगा ?

विकास की सही सूरत: शौचालय या मोबाइल

भारत की 45 प्रतिशत आबादी के पास क़रीब 55 करोड़ मोबाइल फ़ोन हैं. लेकिन हम वर्ष 2008 के आँकड़ों को देखें तो पता चलेगा कि देश की मात्र 31 प्रतिशत आबादी के पास सुधरी हुई सफ़ाई व्यवस्था मौजूद है.

ऐसा क्यों है ... क्या ये सही है... क्यों लोग हर साल ख़राब होने वाले हैंड सेट पर तो ख़र्च करने तैयार हैं ... पर पूरे परिवार के स्वास्थ्य व सुविधा के लिए ज़रूरी शौचालय पर नहीं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ़ के अनुसार अगर ताज़ा आंकड़ों की दिशा और रफ़्तार यही रही तो क़रीब एक अरब लोगों को सफ़ाई व्यवस्था पहुँचाने के वर्ष 2015 तक के लक्ष्य को पूरा नहीं किया जा पाएगा.

नरेगा को पूर्ण सफल बनाएं: प्रधानमंत्री

बुधवार, सितंबर 9, 2009,15:44[IST
Manmohan Singh


नई दिल्ली। ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून [^] (नरेगा) की पूरी सफलता के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्यों से आग्रह किया है कि वे इस कानून का कार्यान्वयन तेजी से करें। इस योजना के तहत गरीबों को साल में कम से कम 100 दिनों के लिए रोजगार की सुरक्षा दी जाती है

प्रधानमंत्री ने राज्य सरकारों से 'गरीबों को निराश' नहीं करने का आग्रह करते हुए कहा कि देश को अभी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (नरेगा) की 'पूरी क्षमता' का अहसास करना है, जिसका 'राज्यों में असमान' कार्यान्वयन हो रहा है।

लंबा सफर

सिंह ने राज्यों के ग्रामीण विकास और पंचायती राज्य मंत्रियों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा, "हाल के वर्षो के इतिहास के इस अद्वितीय कानून की पूरी क्षमता को हासिल करने के लिए हमें अभी लंबा सफर तय करना है। राज्यों के बीच कार्यक्रम का कार्यान्वयन असमान है। कुछ राज्यों ने अच्छा परिणाम दिखाया है। कुछ उनसे पीछे हैं।"

उन्होंने राज्यों से इस संभावना का लाभ उठाने का आग्रह करते हुए कहा, "हम देश के गरीब लोगों को खासकर ऐसे समय में निराश नहीं कर सकते, जबकि कम से कम 100 दिनों के लिए उन्हें आजीविका सुरक्षा उपलब्ध कराने के संसाधन उपलब्ध हैं।"

कार्यक्रम की प्रभावी निगरानी ज़रुरी

नरेगा के लिए आवंटन में इस वर्ष 390 अरब रुपयों की वृद्धि का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, "अब हमें यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि हमारे लोगों को उन पर खर्च किए गए प्रत्येक रुपये का सबसे बेहतर मूल्य मिले। कार्यक्रम की प्रभावी निगरानी सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।"

सिंह ने कहा कि सरकार ने नरेगा के अंतर्गत शिकायतों के प्रभावी तरीके से निपटारे के लिए प्रत्येक जिले में लोकपाल संस्था की स्थापना का प्रस्ताव किया है।

आजीविका मिशनप्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार ने स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना के पुनर्गठन और उसे नया स्वरूप देने के लिए उसको राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन में बदलने का बड़ा [^] फैसला किया है। ग्रामीण इलाकों में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को आजीविका के स्थाई उपाय प्रदान करने और गरीबी दूर करने के लिए मिशन में बहुउद्देश्यीय रणनीति अपनाई जाएगी।

स्वश्थ रहें

श्री श्री रविशंकर

स्वभाविक रहने का अर्थ है कि आपने स्वयं को, दूसरों को और अपने आसपास की सभी वस्तुओं को, वे जैसी हैं, वैसा ही स्वीकार किया है। आपने उसे बोझ जैसे नहीं बल्कि समझ के साथ स्वीकार किया है। जब आप सोचते हैं या महसूस करते हैं कि यह ऐसा होना चाहिए या यह वैसा होना चाहिए तो आप अपने सही स्वभाव में नहीं रहते फिर आप अपनी सीमाओं के सम्पर्क में आ जाते हैं। स्वाभाविक और सुखी नहीं रहने की सीमाएं।

गलतियों का ज्ञान तब मिलता है जब आप मासूम होते हैं। जो गलती हो उसके लिए अपने को पापी न समझें क्योंकि उस वर्तमान क्षण में आप फिर से नवीन, शुद्ध और स्पष्ट हो जाते हैं। भूतकाल की गलतियां भूतकाल हैं। जब यह ज्ञान मिल जाता है तो आप फिर से परिपूर्ण हो जाते हैं। कई बार मां अपने बच्चों पर नाराज होती है और बाद में अपने को दोषी समझती है। क्रोध सजगता की कमी के कारण आता है। स्वयं, सत्य और कौशल का ज्ञान उत्तमता को उभार देता है। इसलिए गलती करने से न डरें परन्तु वही गलती दोबारा न करें। जब आप दूसरों की गलतियां सुधारते हैं तो दो स्थितियां होती हैं। पहली जब आप किसी की गलती सुधारते हो क्योंकि वह आपकी परेशानी का कारण होती है। दूसरी स्थिति में वह आपको परेशान नहीं करती बल्कि इसलिए कि उसका विकास हो सके।

गलतियों को सुधारने के लिए आपको अधिकार और प्रेम की आवश्यकता होती है। अधिकार और प्रेम एक-दूसरे के विरोधाभासी हैं परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। अधिकार के बिना प्रेम दम घुटने जैसा है। प्रेम के बिना अधिकार उथले जैसा है। एक मित्र के पास अधिकार और प्रेम दोनों होना चाहिए परन्तु वह सही मेल में होना चाहिए। यह सिर्फ तब हो सकता है जब आप पूर्णत: आवेगहीन और केन्द्रित होंगे।

जब आप गलतियों के लिए जगह देंगे तो आप दोनों अधिकारपूर्ण और प्यारे हो जाएंगे। दैव इसी तरह के होते हैं। दोनों का सही संतुलन। कृष्ण और ईसा मसीह में दोनों बाते थीं। दूसरों की तरफ उंगली उठाकर गलतियां मत करो। किसी व्यक्ति को उस गलती के बारे में मत बताआ॓ जो उसे पता है, उसने की है। ऐसा करके आप उसे और अधिक अपराधी बना देंगे। एक महान व्यक्ति दूसरों की गलतियों को नहीं पकड़ेगा और उन्हें अपराधी महसूस नहीं होने देगा। वह उन्हें आवेग और देखरेख के साथ ठीक करेगा। जब आप दया दिखाते हैं तो आपका सही स्वभाव सामने आता है। क्या आपने दया के कुछ कृत्य किये हैं किसी से बिना अपेक्षा के? हमारी सेवा बुद्धिहीन नहीं होनी चाहिए। दया के कृत्य के लिए योजना नहीं बनानी चाहिए। जब आप यादृच्छिक दया के कृत्य करते हैं तो अपने सही स्वभाव में आ जाते हैं। अनायास कुछ करें और स्वाभाविक रहें।

सत्संग : सृष्टि का उपहार

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पं. श्रीराम शर्मा आचार्य परमात्मा, ईश्वर, ब्रह्म, परमपिता आदि कई नामों से पुकारी जाने वाली एक अनादि शक्ति का प्रकाश और उसकी प्रेरणा से ही इस जगत को और जगत के पदार्थों को स्फुरण मिल रहा है।

उसी के प्रभाव से सृष्टि के विभिन्न पदार्थों का ज्ञान, कार्य एवं सौन्दर्य प्रतिभासित होता है। वहीं अपने समग्र रूप में अवतीर्ण और सत्य रूप में प्रतिष्ठित होता रहता है। साधक जब विराट जगत के रूप में परमात्मा का दर्शन करता है, उन्हीं की चेतना को सूर्य, पृथ्वी, चन्द्रमा, तारागण आदि में प्रकाशित होते देखता है, तो उसे सत्य का दर्शन होता है। जगत और अध्यात्म का, स्थूल और सूक्ष्म का, दृश्य और तत्व का जहां परिपूर्ण सामंजस्य होता है, वहीं सत्य की परिभाषा पूर्ण होती है और यह सत्य जब जीवन साधना का आधार बनता है, तब जगत की प्रेरक और सर्जन शक्ति का परिचय प्राप्त होता है। इसलिए शास्त्रकारों ने सत्य को ही जीवन का सहज दर्शन माना है।
महर्षि विश्वामित्र ने कहा है-
सत्येनार्क प्रतपति सत्ये तिष्ठति मेदिनी। सत्य व्यक्ति परोधर्म: स्वर्गे सत्ये प्रतिष्ठिति:
अर्थात् सत्य से ही सूर्य तप रहा है, सत्य पर ही पृथ्वी टिकी हुई है। सत्य सबसे बड़ा धर्म है और सत्य पर ही स्वर्ग प्रतिष्ठित है। समग्र अध्यात्म दर्शन का मूल आधार सत्य है। पूर्व और पश्चिम जिस प्रकार एक ही अखंड क्षितिज में स्थित हैं, उसी प्रकार जगत और अध्यात्म, दृश्य और अदृश्य सत्ता एक ही सत्य के दो पहलू हैं। उनमें से एक का भी त्याग करने पर सत्य के दर्शन असंभव हैं। सत्य के साथ शिव और सुन्दर भी जुड़े हुए हैं। शिव अर्थात आनन्द कल्याण और सुन्दर अर्थात् पुलक उत्पन्न करने वाली भावनात्मक विशेषता। जब जगत् की समस्त घटनाओं को केवल बाह्य घटनाएं समझकर उनका विश्लेषण किया जाता है, तो उनसे कोई आनन्द नहीं मिलता। उस स्थिति में घटनाएं और विश्लेषण केवल एक शुष्क मशीनी उपक्रम मात्र बन कर रह जाते हैं। पटरी पर रेल के समान, सड़क पर मोटर के समान, शिलाखंडों पर नदी की धारा के समान मन मानस पर भी जगत की धारा बहती रहती है। चित्त पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ने पाता और सब कुछ निर्जीव, नीरस, अरूचिकर परस्पर लगने लगता है, लेकिन जीवन में नवीनता, सरसता और अहोभाव का समावेश कर लिया जाए, तो परमपिता परमात्मा की यह सृष्टि सुन्दर और सुन्दरतम प्रतीत होती है।
परमात्मा ने सृष्टि के निर्माण में अपनी पूरी कलात्मकता का परिचय दिया है और इस सृष्टि को इतना सुन्दर बनाया है कि उसे रस भाव से देखा जाए, तो यह उपवन असंख्य प्रकार के पुष्पों से महकता-पुलकता अनुभव होने लगे। रात को तारों भरे आकाश की आ॓र निहारें तो लगेगा कि परमात्मा ने आकाश में कितने सुन्दर टिमटिमाते हुए दिए जला दिए हैं, नीले आकाश की काली चादर में कैसे चमकते हुए मोती टांग दिए हैं।